दोहरा रहा है ये सूरज खुद को, हर दिन, बेहिसाब
दोहरा रही है चांदनी
समंदर पटक रहा है उन चट्टानों पर खुद को, बार बार
वोे घनघोर बारिश, वो ओस से गीली सुबह, वो ज़ोरदार धुप
दोहरा रही है ऋतुऐ खुद को, दिन महीने साल, बार बार
दोहराएंगे क्या इस तरह हम भी खुद को,
क्या उन्ही लोगों के बीच फिर शुरुआत होगी,
दोहराएंगे क्या उसी प्रेम, उन्ही सपनो को
क्या तुमसे उसी तरह फिर मुलाकात होगी
दोहराएंगे क्या वो खिलौनो की ज़िद पे पिटाई
वो मोहल्ले की शोर-गुल में पढाई
वो शाम को ताश-पत्तो की बाज़ियां
और नानी के हाथ सेकी हुई रोटियां
क्या दोहराएंगे वही गानो के बोल, रेडियो के संग गाते हुए,
क्या दोहराएंगे वही ठण्ड की रात, साथ बैठ मूंगफली खाते हुए
क्या फिर से तेज़ होगी धड़कने तुम्हारी चिट्ठिया पढ़ते हुए
क्या दोहराएंगे वो चैन की नींद, माँ की लोरियां सुनते हुए
वो सच, वो झूठ, वो नाराज़गी, वो स्नेह
दोहराएंगे क्या खुद को फिर से
अधूरी बातें, अधूरी कहानियां
क्या शुरू होकर अधूरी रह जाएँगी फिर से |
दोहरा रही है चांदनी
समंदर पटक रहा है उन चट्टानों पर खुद को, बार बार
वोे घनघोर बारिश, वो ओस से गीली सुबह, वो ज़ोरदार धुप
दोहरा रही है ऋतुऐ खुद को, दिन महीने साल, बार बार
दोहराएंगे क्या इस तरह हम भी खुद को,
क्या उन्ही लोगों के बीच फिर शुरुआत होगी,
दोहराएंगे क्या उसी प्रेम, उन्ही सपनो को
क्या तुमसे उसी तरह फिर मुलाकात होगी
दोहराएंगे क्या वो खिलौनो की ज़िद पे पिटाई
वो मोहल्ले की शोर-गुल में पढाई
वो शाम को ताश-पत्तो की बाज़ियां
और नानी के हाथ सेकी हुई रोटियां
क्या दोहराएंगे वही गानो के बोल, रेडियो के संग गाते हुए,
क्या दोहराएंगे वही ठण्ड की रात, साथ बैठ मूंगफली खाते हुए
क्या फिर से तेज़ होगी धड़कने तुम्हारी चिट्ठिया पढ़ते हुए
क्या दोहराएंगे वो चैन की नींद, माँ की लोरियां सुनते हुए
वो सच, वो झूठ, वो नाराज़गी, वो स्नेह
दोहराएंगे क्या खुद को फिर से
अधूरी बातें, अधूरी कहानियां
क्या शुरू होकर अधूरी रह जाएँगी फिर से |